Archive for May 2008
माँ – मेरी पहचान
मैं पुष्पा, आज पहली बार “मदर्स डे” के अवसर पर अपने भावनाओं के पट खोल रही हूँ। समाज में और अपने आस-पास घटनेवाली घटनाएँ मेरे मन को छू जाती हैं । रिश्तों को इतने सस्ते में बिकते देख मन व्यथित हो उठता है । खास कर माँ के दिल को ठेस पहुँचाना एक बडा पाप मानती हूं । बडे अभागे होते है वो लोग जो माँ के प्रेम का तोल-मोल करते है और भौतिक सुख के आगे उन्हें माँ बडी छोटी नज़र आती है ।
आज मुझे अपनी माँ बहुत याद आ रही है । वैसे तो माँ कोई भूलनेवाली चीज़ नही है । उनका तो हर रुप आँखों में बसा रहता है । मैं आज भी उनके झुर्रियों से भरे चेहरे में अपना बचपन ढूँढती रहती हूँ । माँ, तुझे मेरी भी उम्र लगे ।
माँ, तुझे सलाम..!
मंदिर की घंटियाँ बजा-बजाकर
यह किसे बुला रहा है
कौन से मंत्र दोहरा रहा है
और तू किसे मना रहा है ?
घर के एक कोने में जिसे छोड़ आया है
जिसका भ्रम और अभिमान तोड़ आया है
नज़रें उठा कर देख, पहचान उसे
वह माँ है या भगवान का साया है ।
आज जो वह आँसू बहा रही है
मूक ज़बान से कुछ कहे जा रही है
कानों में पड़ते नहीं तेरे, बोल जिसके
फ़रियादी बन वह तेरे दर को हिला रही है ।
मूर्ख ! क्यों इतना तू भरमाया है
नसीबवालों को मिलता माँ रुपी साया हैl
कौनसी गफ़लत में पड़ गया है तू
माँ गवाँकर तूने तो सब कुछ गँवाया है ।
पुष्पा कुमार
Add comment May 12, 2008