दो शब्द

दो शब्द

मिला तुम्हारा साथ
है हाथों में हाथ
जज़बातों को बहकने दो
दो शब्द कहने दो।

निशाँ छोड़ते जा रहे कदम
साए साथ न देते सनम
मुझे यूँ ही साथ चलने दो
दो शब्द कहने दो।

जिन्दगी के झंझावात
कभी न छूटे साथ
गिरकर संभलने दो
दो शब्द कहने दो।

उम्र की ढलान पर
शाद और अवसाद पर
कसम पूरी करने दो
दो शब्द कहने दो।

पुष्पा कुमार “सुमान्या”

1 comment June 8, 2008 pushpkri

माँ – मेरी पहचान

मैं पुष्पा, आज पहली बार “मदर्स डे” के अवसर पर अपने भावनाओं के पट खोल रही हूँ।  समाज में और अपने आस-पास घटनेवाली घटनाएँ मेरे मन को छू जाती हैं ।  रिश्तों को इतने सस्ते में बिकते देख मन व्यथित हो उठता है ।  खास कर माँ के दिल को ठेस पहुँचाना एक बडा पाप मानती हूं ।  बडे अभागे होते है वो लोग जो माँ के प्रेम का तोल-मोल करते है और भौतिक सुख के आगे उन्हें माँ बडी छोटी नज़र आती है ।

आज मुझे अपनी माँ बहुत याद आ रही है । वैसे तो माँ कोई भूलनेवाली चीज़ नही है । उनका तो हर रुप आँखों में बसा रहता है ।  मैं आज भी उनके झुर्रियों से भरे चेहरे में अपना बचपन ढूँढती रहती हूँ ।  माँ, तुझे मेरी भी उम्र लगे ।

माँ,  तुझे सलाम..!

मंदिर की घंटियाँ बजा-बजाकर
यह किसे बुला रहा है
कौन से मंत्र दोहरा रहा है
और तू किसे मना रहा है ?

घर के एक कोने में जिसे छोड़ आया है
जिसका भ्रम और अभिमान तोड़ आया है
नज़रें उठा कर देख, पहचान उसे
वह माँ है या भगवान का साया है ।

आज जो वह आँसू बहा रही है
मूक ज़बान से कुछ कहे जा रही है
कानों में पड़ते नहीं तेरे, बोल जिसके
फ़रियादी बन वह तेरे दर को हिला रही है ।

मूर्ख ! क्यों इतना तू भरमाया है
नसीबवालों को मिलता माँ रुपी साया हैl
कौनसी गफ़लत में पड़ गया है तू
माँ गवाँकर तूने तो सब कुछ गँवाया है ।

पुष्पा कुमार

Add comment May 12, 2008 pushpkri

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